भीनमाल की होली में बाबैया ढोल की खास धुन, इतिहास में बसता है इसका महत्व
राजस्थान के भीनमाल में होली के दिन बाबैया ढोल की थाप सुनाई देती है, जो साल में केवल एक बार बजता है। इस ढोल की धुन से घोटा गैर की शुरुआत होती है और यह भीनमाल की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है।
स्रोत: : News18
राजस्थान के भीनमाल शहर में होली के त्योहार पर बाबैया ढोल की आवाज पूरे इलाके में गूंजती है। यह ढोल साल में केवल एक बार होली के दिन ही बजाया जाता है। इसकी धुन से ही घोटा गैर नामक परंपरागत नृत्य की शुरुआत होती है, जो भीनमाल की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है।
बाबैया ढोल की धुन सदियों से भीनमाल की होली परंपरा का हिस्सा रही है। इसे स्थानीय लोग अपने इतिहास और सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखते हैं। इस ढोल की थाप से न केवल त्योहार की शुरुआत होती है, बल्कि यह लोगों को एकजुट करने का काम भी करती है। माना जाता है कि इसकी आवाज सुनकर ही लोग घोटा गैर के लिए इकट्ठा होते हैं, जो समुदाय के बीच मेलजोल और भाईचारे को बढ़ावा देता है।
बाबैया ढोल की थाप से जुड़े इस आयोजन का भीनमाल के लोगों पर गहरा सामाजिक प्रभाव पड़ता है। यह न केवल धार्मिक उत्सव का हिस्सा है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने में मदद करता है। होली के इस खास मौके पर ढोल की आवाज सुनकर लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से अलग होकर एक साथ मिलते हैं और त्योहार का आनंद लेते हैं।
इस प्रकार, बाबैया ढोल की धुन भीनमाल की सांस्कृतिक विरासत को मजबूती प्रदान करती है और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक बनी हुई है। यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक बनी रहे, इसके लिए स्थानीय समुदाय इसे बड़े सम्मान के साथ निभाता है।
स्रोत: : News18
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