बिहार के सहरसा के बनगांव में 200 साल पुरानी अनोखी होली की परंपरा, IAS-IPS अधिकारी भी खेलते हैं रंग

सहरसा जिले के बनगांव में घमौर होली की 200 साल पुरानी परंपरा है, जहां IAS-IPS अधिकारी भी आम लोगों के साथ कंधों पर चढ़कर होली मनाते हैं। भगवती स्थान पर भाईचारे और एकता का संदेश मिलता है, और यह होली पूरे देश में प्रसिद्ध है।

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बनगांव की 200 साल पुरानी घमौर होली

बिहार के सहरसा जिले के बनगांव में हर साल एक खास और अनोखी होली मनाई जाती है, जिसे घमौर होली कहा जाता है। यह परंपरा करीब 200 साल पुरानी है और इसे स्थानीय लोग बड़े उत्साह से मनाते हैं। खास बात यह है कि इस होली में सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि IAS और IPS अधिकारी भी भाग लेते हैं। वे भी कंधों पर चढ़कर इस रंगों के त्योहार में शामिल होते हैं।

होली का खास तरीका और महत्व

घमौर होली की परंपरा भगवती स्थान पर होती है, जो बनगांव का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहां होली के दौरान लोग एक-दूसरे के साथ रंग खेलते हैं और भाईचारे का संदेश देते हैं। यह त्योहार सामाजिक एकता और मेलजोल का प्रतीक माना जाता है। इस अनोखे तरीके से होली मनाने की वजह से यह परंपरा पूरे देश में प्रसिद्ध हो चुकी है।

इस परंपरा का असर

घमौर होली में प्रशासनिक अधिकारियों का भी हिस्सा लेना स्थानीय लोगों और अधिकारियों के बीच दूरी कम करता है। इससे समाज में एकता और सहयोग की भावना मजबूत होती है। साथ ही, यह परंपरा युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में मदद करती है। इस तरह की परंपराएं सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में मददगार साबित होती हैं।

इस अनोखी होली के माध्यम से बनगांव का नाम न केवल बिहार में बल्कि पूरे देश में जाना जाता है। यह परंपरा दिखाती है कि रंगों का त्योहार केवल खुशी का मौका नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का एक जरिया भी है।

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प्रश्न 1: बनगांव की घमौर होली कितनी पुरानी है?

प्रश्न 2: घमौर होली में कौन-कौन लोग भाग लेते हैं?

प्रश्न 3: घमौर होली का मुख्य धार्मिक स्थल कौन सा है?

प्रश्न 4: घमौर होली का क्या सामाजिक महत्व है?

प्रश्न 5: घमौर होली के कारण बनगांव का नाम कहाँ प्रसिद्ध हुआ?


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