उत्तराखंड की भिटौली परंपरा: शादी के बाद भी मायके से जुड़ी बेटी का प्यार

उत्तराखंड की सदियों पुरानी भिटौली परंपरा में, चैत्र के महीने में घुघुती पक्षी की आवाज के बीच बेटियां अपने मायके की पगडंडियों को देख खुश होती हैं। भाई या पिता हाथ में उपहार लेकर बेटी के घर आते हैं, जो बचपन की यादों को ताजा करता है।

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उत्तराखंड की भिटौली परंपरा: शादी के बाद भी मायके से जुड़ी बेटी का प्यार

उत्तराखंड की एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा 'भिटौली' हर साल चैत्र महीने में मनाई जाती है। इस परंपरा में शादी के बाद भी बेटियां अपने मायके से जुड़ी रहती हैं और मायके की पगडंडियों को देखकर खुशी महसूस करती हैं। भिटौली परंपरा में परिवार के सदस्य, खासकर भाई या पिता, हाथ में उपहार लेकर बेटी के घर जाते हैं। यह परंपरा परिवार के बीच प्रेम और अपनापन बनाए रखने का एक सुंदर तरीका है।

भिटौली परंपरा का महत्व

भिटौली परंपरा का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह बेटियों को मायके से जोड़कर रखती है। शादी के बाद अक्सर बेटियां अपने ससुराल में रहती हैं, लेकिन भिटौली के जरिए वे अपनी जड़ों से जुड़ी रहती हैं। इस दिन भाई या पिता उपहार लेकर बेटी के घर जाते हैं और बचपन की यादें ताजा करते हैं। यह परंपरा परिवारों में प्रेम और सम्मान की भावना को बढ़ावा देती है और सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाती है।

इस परंपरा का प्रभाव

भिटौली का सबसे बड़ा प्रभाव यह होता है कि इससे बेटियों को मायके की यादें और अपनापन मिलता है। इसके अलावा, यह परंपरा परिवार के सदस्यों के बीच संवाद और मेलजोल को बढ़ावा देती है। इससे परिवार के बीच की दूरी कम होती है और भावनात्मक संबंध मजबूत होते हैं। उत्तराखंड की यह परंपरा आधुनिक समय में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखती है और सामाजिक एकता का प्रतीक बनी हुई है।

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प्रश्न 1: भिटौली परंपरा कब मनाई जाती है?

प्रश्न 2: भिटौली में कौन उपहार लेकर बेटी के घर जाता है?

प्रश्न 3: भिटौली परंपरा का मुख्य उद्देश्य क्या है?

प्रश्न 4: भिटौली परंपरा से क्या बढ़ता है?

प्रश्न 5: भिटौली परंपरा किस राज्य की है?


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